नाथूराम गोडसे

 लेखक - डॉशंकर शरण


नाथूराम गोडसे के नाम और उनके एक काम के अतिरिक्त लोग उन के बारे में कुछ नहीं जानते। एक लोकतांत्रिक देश में यह कुछ रहस्यमय बात है। रहस्य का आरंभनवंबर 1948 को ही हो गया थाजब गाँधीजी की हत्या के लिए चले मुकदमे में गोडसे द्वारा दिए गए बयान को प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।गोडसे का बयान लोग जानेंइस पर प्रतिबंध क्यों लगा?


इस का कुछ अनुमान जस्टिस जी.डीखोसलाजो गोडसे मुकदमे की सुनवाई के एक जज थेकी टिप्पणी से मिल सकता है। अदालत में गोडसे ने अपनी बात पाँचघंटे लंबे वक्तव्य के रूप में रखी थीजो 90 पृष्ठों का था। जब गोडसे ने बोलना समाप्त किया तब का दृश्य जस्टिस खोसला के शब्दों में... “सुनने वाले स्तब्ध औरविचलित थे। एक गहरा सन्नाटा थाजब उसने बोलना बंद किया। महिलाओं की आँखों में आँसू थे और पुरुष भी खाँसते हुए रुमाल ढूँढ रहे थे।… मुझे कोई संदेहनहीं हैकि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित लोगों की जूरी बनाई जाती और गोडसे पर फैसला देने कहा जाता तो उन्होंने भारी बहुमत से गोडसे के ‘निर्दोष’ होने काफैसला दिया होता।” (" मर्डर ऑफ महात्मा एन्ड अदर केसेज फ्रॉम  जजेस नोटबुकपृ. 305-06)


यही नहींतब देश के कानून मंत्री डॉअंबेडकर थे। उन्होंने गोडसे के वकील को संदेश भेजा कि यदि गोडसे चाहें तो वे उन की सजा आजीवन कारावास में बदलवासकते हैं। गाँधीजी वाली अहिंसा दलील के सहारे यह करवाना सरल था। किंतु गोडसे ने आग्रह पूर्वक मना करउलटे डॉअंबेदकर को लौटती संदेश यह दिया, “कृपया सुनिश्चित करें कि मुझ पर कोई दया  की जाए। मैं अपने माध्यम से यह दिखाना चाहता हूँ कि गाँधी की अहिंसा को फाँसी पर लटकाया जा रहा है।


गोडसे का यह कथन कितना लोमहर्षक सच साबित हुआयह भी यहाँ इतने निकट इतिहास का एक छिपाया गया तथ्य है!


गाँधीजी की हत्या के बाद गाँधी समर्थकों ने बड़े पैमाने पर गोडसे की जाति-समुदाय की हत्याएं की। गाँधी पर लिखीछपी सैकड़ों जीवनियों में कहीं यह तथ्य नहींमिलता कि कितने चितपावन ब्राह्मणों को गाँधीवीदियों ने मार डाला था।


31 दिसंबर 1948 के "न्यूयॉर्क टाइम्समें प्रकाशित समाचार के अनुसारकेवल बंबई में गाँधीजी की हत्या वाले एक दिन में ही 15 लोगों को मार डाला गया था।पुणे के स्थानीय लोग आज भी जानते हैं कि वहाँ उस दिन कम से कम 50 लोगों को मार डाला गया था। कई जगह हिंदू महासभा के दफ्तरों को आग लगाई गई।चितपावन ब्राह्मणों पर शोध करने वाली अमेरिकी अध्येता मौरीन पैटरसन ने लिखा है कि सबसे अधिक हिंसा बंबईपुणेनागपुर आदि नहींबल्कि सताराबेलगामऔर कोल्हापुर में हुई। तब भी सामुदायिक हिंसा की रिपोर्टिंग पर कड़ा नियंत्रण था। अतःमौरीन के अनुसारउन हत्याओं के दशकों बीत जाने बाद भी उन्हें उनपुलिस फाइलों को देखने नहीं दिया गयाजो 30 जनवरी 1948 के बाद चितपावन ब्राह्मणों की हत्याओं से संबंधित थीं।


इस प्रकारउस ‘गाँधीवादी हिंसा’ का कोई हिसाब अब तक सामने नहीं आने दिया गया हैजिस में असंख्य निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को इसलिए मार डाला गयाथा क्योंकि गोडसे उसी जाति के थे। निस्संदेहराजनीतिक जीवन में गाँधीजी के कथित अहिंसा सिद्धांत के भोंडेपन का यह एक व्यंग्यात्मक प्रमाण थाचाहेकांग्रेसीशासन और वामपंथी बौद्धिकों ने इन तथ्यों को छिपाकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया।


कडवा सच तो यह है कि गोडसे ने गाँधीजी की हत्या करके उन्हें वह महानता प्रदान करने में केंद्रीय भूमिका निभाईजो सामान्य मृत्यु से उन्हें मिलने वाली नहीं थी।स्वतंत्रता से ठीक पूर्व और बाद देश में गाँधी का आदर कितना कम हो गया थायह 1946-48 के अखबारों के पन्नों को पलट कर सरलता से देख सकते हैं।नोआखली में गाँधी के रास्ते में पर लोगों ने टूटे काँच बिछा दिए थे। ऐसी वितृष्णा अकारण  थी। देश विभाजन रोकने के लिए गाँधी ने अनशन नहीं कियाऔरअपना वचन (‘विभाजन मेरी लाश पर होगा’) तोड़ायह तो केवल एक बात थी।


पश्चिमी पंजाब से आने वाले हजारों हिंदू-सिखों को उलटे जली-कटी सुनाकर गाँधी उनके घावों पर नमक छिड़कते रहते थे। दिल्ली की दैनिक प्रार्थना-सभा में गाँधीउन अभागों को ताने देते थेकि वे जान बचाकर यहाँ क्यों चले आयेवहीं रहकर मर जाते तो अहिंसा की विजय होतीआदि। फिरविभाजन रोकने या पाकिस्तान मेंहिंदू-सिखों की जान को तो गाँधीजी ने अनशन नहीं कियाकिन्तु भारत पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये देइसके लिए गाँधीजी ने जनवरी 1948 में अनशन कियाथातब कश्मीर पर पाकिस्तानी हमला जारी थाऔर गाँधीजी के अनशन से झुककर भारत सरकार ने वह रकम पाकिस्तान को दी। यह विश्व-इतिहास में पहलीघटना थी जब किसी आक्रमित देश ने आक्रमणकारी कोयानी अपने ही विरुद्ध युद्ध को वित्तीय सहायता दी!


गोडसे द्वारा गाँधीजी को दंड देने के निश्चय में उस अनशन ने निर्णायक भूमिका अदा की। तब देश में लाखों लोग गाँधीजी को नित्य कोस रहे थे। पाकिस्तान से जानबचाकर भागे हिन्दू-सिख गाँधी से घृणा करते थे। वही स्थिति कश्मीरी और बंगाली हिन्दुओं की थी। ‘हिंद पॉकेट बुक्स’ के यशस्वी संस्थापक दीनानाथ मल्होत्रा नेअपनी संस्मरण पुस्तक ‘भूली नहीं जो यादें’ (पृ. 168) में उल्लेख किया है कि जब गाँधीजी की हत्या की पहली खबर आईतो सब ने स्वतः मान लिया कि किसीपंजाबी ने ही उन्हें मारा।


फिरउन लाखों बेघरोंशरणार्थियों के सिवा पाकिस्तान में हिन्दुओ का जो कत्लेआम हुआऔर जबरन धर्मांतरण कराए गएउस पर भारत में दुःखआक्रोश औरसहज सहानुभूति थी। यह सब गाँधीजी के प्रति क्षोभ में भी व्यक्त होता था। विशेषकर तबजब वे पंजाबी हिन्दुओंसिखों को सामूहिक रूप से मर जाने का उपदेशदेते हुए यहाँ मुसलमानों (जो वैसे भी असंगठितअरक्षितभयाक्रांत नहीं थे जैसे पाकिस्तान में हिन्दू थे। नहीं तो वे यहीं रह  सके होतेऔर उनकी संपत्ति की रक्षाके लिए सरकार पर कठोर दबाव बनाए हुए थे।


इस तरहदुर्बल को अपने हाल पर छोड़ कर गाँधी सबल की रक्षा में व्यस्त थेयह पूरे देश के सामने तब आइने की तरह स्पष्ट था। अतः उस समय की संपूर्णपरिस्थिति का अवलोकन करते हुए यह बात वृथा नहीं कियदि गाँधीजी प्राकृतिक मृत्यु पातेतो आज उन का स्थान भारतीय लोकस्मृति में बालगंगाधार तिलकजयप्रकाश नारायणआदि महापुरुषों जैसा ही कुछ रहा होता। तीन दशक तक गाँधी की भारतीय राजनीति में अनगिनत बड़ी-बड़ी विफलताएं जमा हो चुकी थीं।खलीफत-समर्थन से लेकर देश-विभाजन तकमुस्लिमों को ‘ब्लैंक चेक’ देने जैसे नियमित सामुदायिक पक्षपात और अपने सत्य-अहिंसा-ब्रह्मचर्य सिद्धांतों केविचित्रहैरत भरेयहाँ तक कि अनेक निकट जनों को धक्का पहुँचाने वाले कार्यान्वयन से बड़ी संख्या में लोग गाँधीजी से वितृष्ण हो चुके थे। लेकिन गोडसे कीगोली ने सब कुछ बदल कर रख दिया। इसलिए भक्त गाँधीवादियों को तो गोडसे का धन्यवाद करते हुएबतर्ज अनिल बर्वे, “थैंक यूमिस्टर गोडसे!” जैसी भावनारखनी चाहिए।


गोडसे ने चाहे गाँधी को दंड देने का लिए गोली मारीलेकिन वस्तुतः उसी नाटकीय अवसान से गाँधीजी को वह महानता मिल सकीजो वैसे संभवतः  मिली होती।भारत में नेहरूवादी और मार्क्सवादी इतिहासकारों द्वारा घोर इतिहास-मिथ्याकरण का एक अध्याय यह भी है कि लोग गोडसे के बारे में कुछ नहीं जानतेयहाँ तककि गाँधी-आलोचकों की लिस्ट में भी गोडसे का उल्लेख नहीं होता। इसी विषय पर लिखी इतिहासकार बीआरनंदा की पुस्तक, "गाँधी एन्ड हिज क्रिटिक्स" (1985) में भी गोडसे का नाम नहींजबकि गोडसे का 90 पृष्ठों का वक्तव्यजो 1977 के बाद पुस्तिका के रूप में प्रकाशित होता रहा हैगाँधीजी के सिद्धांतों औरकार्यों की एक सधी आलोचना है। लेकिन 67 वर्ष बीत गएगोडसे की उस आलोचना का किसी भारतीय ने उत्तर नहीं दिया।  उस की कोई समीक्षा की गई। यदिगोडसे की बातें प्रलापमूर्खतापूर्णअनर्गलआदि होतींतो उन्हें प्रकाशित करने पर प्रतिबंध नहीं लगा होतालोग उसे स्वयं देखतेसमझते कि गाँधीजी की हत्याकरने वाला कितना मूढ़जुनूनी या सांप्रदायिक था। पर स्थिति यह है कि विगत 38 वर्ष से गोडसे का वक्तव्य उपलब्ध रहने पर भी एक यूरोपीय विद्वान (कोएनराडएल्स्ट, "गांधी एंड गोडसेः  रिव्यू एंड  क्रिटीक" 2001) के अतिरिक्त किसी भारतीय ने उस की समीक्षा नहीं की है। क्यों?


संभवतः इसीलिएक्योंकि उसे उपेक्षित तहखाने में दबे रहना ही प्रभावी राजनीति के लिए सुविधाजनक था। गोडसे की अनेक बातें संपूर्ण समकालीन सेक्यूलरभारतीय राजनीति की भी आलोचना हो जाती है। इस अर्थ में वह आज भी प्रासंगिक है। यह भी कारण है कि यहाँ राजनीतिक रूप से प्रभावी इतिहासकारोंबुद्धिजीवियों ने उसे मौन की सेंसरशिप से अस्तित्वहीन-सा बनाए रखा है। अन्यथा कोई कारण नहीं कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज का कहीं उल्लेख  हो। इतिहास राजनीति में उस का अध्ययनविश्लेषण किया जाए। यह चुप्पी सहज नहीं है। यह न्याय नहीं है।


इस सायास चुप्पी का कारण यही प्रतीत होता है कि किसी भी बहाने यदि गोडसे के वक्तव्य को नई पीढ़ी पढ़ेऔर परखेतो आज भी भारी बहुमत से लोगों कानिर्णय वही होगाजो जस्टिस खोसला ने तब अदालत में उपस्थित नर-नारियों का पाया था। तब गोडसे को ‘हिन्दू सांप्रदायिक’ या ‘जुनूनी हत्यारा’ कहना संभव नहींरह जाएगा।


वस्तुतः नाथूराम गोडसे के जीवनचरित्र और विचारों का समग्र मूल्यांकन करने से उन का स्थान भगत सिंह और ऊधम सिंह की पंक्ति में चला जाएगा। तीनों देश-भक्त थे। तीनों को राजनीतिक हत्याओं के लिए फाँसी हुई। तीनों ने अपने-अपने शिकारों को करनी का ‘दंड’ दियाजिस से सहमति रखना जरूरी नहीं। मगर तीनोंकी दृष्टि में एक समानता तो है ही। भगत सिंह ने पुलिस की लाठी से लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को अंग्रेज पुलिसअधीक्षक जॉन साउंडर्स की हत्या की। ऊधम सिंह ने जलियाँवाला नरसंहार करने वाले कर्नल माइकल डायर को 13 मार्च 1940 को गोली मार दी। उसी तरहनाथूराम गोडसे ने भी गाँधी को देश का विभाजनलाखों हिन्दुओं-सिखों के साथ विश्वासघातउन के संहार  विध्वंस तथा हानिकारक सामुदायिक राजनीति करनेका कारण मानकर उन्हें 30 जनवरी 1948 को गोली मारी थी।


आगे की तुलना में भीजैसे अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह और ऊधम सिंह को हत्या का दोषी मानकर उन्हें फाँसी दीउसी तरह भारत सरकार ने भी नाथूराम गोडसे कोफाँसी दी। तीनों के कर्मतीनों की भावनाएंतीनों का जीवन-चरित्र मूलतः एक जैसा है। इस सचाई को छिपाया नहीं जाना चाहिए।


उक्त निष्कर्ष डॉलोहिया के विचारों से भी पुष्ट होता है। देश का विभाजन होने पर लाखों लोग मरेंगेयह गाँधीजी जानते थेफिर भी उन्होंने उसे नहीं रोका। बल्किनेहरू की मदद करने के लिए खुद कांग्रेस कार्य-समिति को विभाजन स्वीकार करने पर विवश किया जो उस के लिए तैयार नहीं थी। इसे लोहिया ने गाँधी काअक्षम्य’ अपराध माना है। तब इस अपराध का क्या दंड होता?


संभवतः सब से अच्छा दंड गाँधी को सामाजिकराजनीतिक रूप से उपेक्षित करनाऔर अपनी सहज मृत्यु पाने देना होता। परअफसोस!


डॉलोहिया के शब्दों पर गंभीरता से विचार करें – विभाजन से दंगे होंगेऐसा तो गाँधीजी ने समझ लिया थालेकिन “जिस जबर्दस्त पैमाने पर दंगे वास्तव में हुएउसका उन्हें अनुमान  थाइस में मुझे शक है। अगर ऐसा थातब तो उन का दोष अक्षम्य हो जाता है। दरअसल उन का दोष अभी भी अक्षम्य है। अगर बँटवारे केफलस्वरूप हुए हत्याकांड के विशाल पैमाने का अन्दाज उन्हें सचमुच थातब तो उन के आचरण के लिए कुछ अन्य शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ेगा।” ("गाँधीजी केदोष")


ध्यान देंसौजन्यवश लोहिया ने गाँधी के प्रति उन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जो उन के मन में आए होंगे। किंतु वह शब्द छलअज्ञानहिन्दुओं के प्रतिविश्वासघातबुद्धि का दिवालियापनजैसे ही कुछ हो सकते हैं। इसलिएजिस भावनावश गोडसे ने गाँधीजी को दंडित किया वह उसी श्रेणी का है जो भगतसिंहऔर ऊधम सिंह का था। इस कड़वे सत्य को भी लोहिया के सहारे वहीं देख सकते हैं। लोहिया के अनुसार, “देश का विभाजन और गाँधीजी की हत्या एक ही सिक्केके दो पहलू हैं। एक पहलू की जाँच किए बिना दूसरे की जाँच करना समय की मूर्खतापूर्ण बर्बादी है।” यह कथन क्या दर्शाता हैयहीकि वैसा  करके क्षुद्रराजनीतिक चतुराई की गई। तभी तो जिस किसी को ‘गाँधी के हत्यारे’ कहकर निंदित किया जाता हैजबकि विभाजन की विभीषिका से उस हत्या के संबंध कीकभी जाँच नहीं होती। क्योंकि जैसे ही यह जाँच होगीजिसे लोहिया ने जरूरी माना थावैसे ही गोडसे का वही रूप सामने होगा जो उन्हें भगत सिंह और ऊधम सिंहके सिवा और किसी श्रेणी में रखने नहीं देगा। इस निष्कर्ष से गाँधी-नेहरूवादी तथा दूसरे भी मतभेद रख सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे असंख्य अंग्रेज लोग भगत सिंहऔर ऊधम सिंह से रखते ही रहे हैं। आखिर वे तो हमारे भगत सिंह और ऊधम सिंह को पूज्य नहीं मानतेलेकिन वे दोनों ही भारतवासियों के लिए पूज्य हैं। ठीक उसीतरहयदि हिंदू महासभा या कोई भी हिन्दू नाथूराम गोडसे को सम्मान से देखता है और उन्हें सम्मानित करना चाहता है तो इसे सहजता से लेना चाहिए।


आखिरभगत सिंह या ऊधम सिंह के प्रति भी हमारा सम्मान उन के द्वारा की गई हत्याओं का सम्मान नहीं है। वह एक भावना का सम्मान हैजो सम्मानजनक थी।अतः नाथूराम गोडसे के प्रति किसी का आदर भी देश-भक्तिराष्ट्रीय आत्मसम्मान और न्याय भावना का ही आदर भी हो सकता है। जिन्हें इस संभावना पर संदेह होवे गोडसे का वक्तव्य एक बार आद्योपांत पढ़ने का कष्ट करें।

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