क्या महर्षि वाल्मीकि पहले डाकू थे?


 

क्या महर्षि वाल्मीकि पहले डाकू थे?

 एक सवाल जो हमने -आपने हम सबने सुनी है.. 

अब वाल्मीकि एक आदिकवि ही थे या डाकू वाले कोई अलग ऋषि थे, इस पर संशय है..


एक धरा जो स्पष्ट रूप से विकृत इतिहास को प्रचारित करता रहा है,तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ के ‘उल्टा नाम जपत जग जाना, बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना’ नामक एक चौपाई का उदाहरण देता है,साथ ही ऐसे हीं कई और लिखित प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं लेकिन तथ्य यह है कि ये सब बाद में लिखी गई एवं महर्षि वाल्मीकि के बारे में वही प्रामाणिक होगा, जो रामायण के रचनाकाल के समय का होगा..


 अब आते हैं रामायण के उत्तर कांड के उस हिस्से पर जहाँ महर्षि वाल्मीकि का जिक्र मिलता है,‘उत्तर कांड’ में माता सीता की पवित्रता का परिचय देते हुए महर्षि वाल्मीकि ने राम दरबार में खुद का कुछ यूँ परिचय दिया है, 

                प्रेचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनंदन।

             मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्वं न किल्विषम्।।


जिसका भावार्थ है – हे राम! मैं प्रचेता मुनि का दसवाँ पुत्र हूँ और मैंने अपने जीवन में कभी भी मन, क्रम या वचन से कोई पापपूर्ण कार्य नहीं किया है। प्रचेता परमपिता ब्रह्मा के पुत्र थे.. उन्हें कहीं-कहीं वरुण भी कहा गया है। इस तरह से महर्षि वाल्मीकि भी ब्रह्मा के पौत्र हुए.. 


Opindia की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘दलित साहित्य’ पर शोध कर चुके दिवंगत लेखक ओमप्रकश वाल्मीकि ने महर्षि वाल्मीकि को डाकू नहीं माना था..


इसके साथ उसी रिपोर्ट में डॉक्टर मंजुला सहदेव के शोध का भी जिक्र है.. उन्होंने पाया कि छठी शताब्दी से पहले के किसी भी साहित्य में वाल्मीकि के पहले डाकू होने का जिक्र नहीं है.. महर्षि वाल्मीकि के बारे में बताया जाता है कि उन्होंने तमसा नदी के तट पर रामायण की रचना की थी.. यहाँ तक कि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी माना है कि वाल्मीकि पहले डाकू नहीं थे..


उस रिपोर्ट के एक हिस्से में यह भी कहा गया है कि,लीलाधर शर्मा ‘पर्वतीय’ ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति कोष‘ में लिखा है कि ऋषि भृगु भी वाल्मीकि के भाई थे और दोनों ही परम ज्ञानी थे.. उन्होंने लिखा है कि जिन वाल्मीकि के डाकू होने की बात कही जाती है, वो कोई अलग थे और पौराणिक मत है कि वो रामायण के रचयिता से भिन्न थे.. आजकल की कुछ कहानियों में तो इतना हेरफेर किया गया है कि अंगुलिमाल डाकू, जिसे बुद्ध के काल का बताया जाता है, उसे भी वाल्मीकि बता दिया जाता है..


 इसके साथ-साथ कई अन्य इतिहासकारों ने भी पाया है कि ये डाकू वाले वाल्मीकि उस आदिकवि से भिन्न हैं,जिन्होंने रामायण की रचना की है.. 


लेकिन अंततः जैसे प्रेमिकाओं के पप्पा कभी माने नहीं हैं क्योंकि उन्हें मानना ही नहीं होता है,वैसे हीं कुछ बुद्धिजीवी जिन्हें न जाने किसने बुद्धिजीवी कहा है वो भी नहीं मानेंगे ,इसलिए आप मानिए और दूसरों को मनवाने में अपना खून न जलाइए.. 


 #वाल्मीकि_जयंती की शुभकामनाएँ

Post a Comment

Previous Post Next Post